pilgrims gather at the kaaba in mecca
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Umrah in Islam – उमराह के फ़र्ज़ और सुन्नत तरीक़ा” 786

Paragraph 1 (English)

pilgrims gather at the kaaba in mecca
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Paragraph 2 (Hindi)

उमराह मक्का की तरफ़ किया जाने वाला मुक़द्दस सफ़र है।
इसे अक्सर “छोटा हज” भी कहा जाता है।
हज की तरह यह फ़र्ज़ नहीं लेकिन बहुत अफ़ज़ल इबादत है।
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने कई बार उमराह अदा किया।
यह गुनाहों को धो देता है और ईमान को ताज़ा करता है।
उमराह इंसान को अल्लाह की रहमत के क़रीब करता है।
इसमें कुछ फ़र्ज़ और कुछ सुन्नत तरीक़े हैं।
यह सफ़र इंसानियत और फ़रमाबरदारी का पैग़ाम देता है।


Paragraph 3 (English – Fard 1: Ihram)

pilgrims gather at masjid al haram in makkah
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Paragraph 4 (Hindi – फ़र्ज़ 1: एहराम)

उमराह का पहला फ़र्ज़ एहराम है।
यह मीक़ात से निय्यत करके शुरू होता है।
मर्द दो सफ़ेद चादरें पहनते हैं और औरतें सादगी वाला लिबास।
एहराम की हालत में बाल-क़तरना, नाख़ून काटना और शिकार करना मना है।
यह अल्लाह के सामने बराबरी और तवाज़ो की निशानी है।
इस दौरान “लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक” पढ़ा जाता है।
यही बंदगी और सफ़र की शुरुआत है।
एहराम उमराह का पहला और अहम रुक्न है।


Paragraph 5 (English – Fard 2: Tawaf)


Paragraph 6 (Hindi – फ़र्ज़ 2: तवाफ़)

उमराह का दूसरा फ़र्ज़ काबा का तवाफ़ करना है।
सात चक्कर लगाना ज़रूरी है जिसकी शुरुआत हज्र-ए-असवद से होती है।
यह पाकी और वुज़ू की हालत में होना चाहिए।
तवाफ़ मुसलमानों की एकता और बराबरी का निशान है।
हर चक्कर अल्लाह की फ़रमाबरदारी की याद दिलाता है।
हज्र-ए-असवद को छूना या उसकी तरफ़ इशारा करना सुन्नत है।
इस दौरान दुआ और ज़िक्र किया जाता है।
तवाफ़ उमराह की रूहानी हक़ीक़त को उजागर करता है।


Paragraph 7 (English – Fard 3: Sa’i)

crowd of pilgrims around kaaba
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Paragraph 8 (Hindi – फ़र्ज़ 3: सई)

उमराह का तीसरा फ़र्ज़ सई है।
सफ़ा और मरवा के बीच सात बार आना-जाना करना होता है।
यह हज़रत हाजरा (अ.स) की क़ुर्बानी और सब्र की याद है।
उन्होंने बेटे इस्माइल (अ.स) के लिए पानी ढूँढा था।
यह अमल अल्लाह की रहमत पर भरोसा करना सिखाता है।
मर्द हरे निशानों के बीच हल्की दौड़ लगाते हैं।
औरतें आराम और इबादत के साथ चलती हैं।
सई सब्र और तवक्कुल का सबक़ देती है।


Paragraph 9 (English – Fard 4: Halq/Taqsir)


Paragraph 10 (Hindi – फ़र्ज़ 4: हल्क/तक़सीर)

उमराह का आख़िरी फ़र्ज़ हल्क या तक़सीर है।
मर्द सर के बाल मुँडाते या छोटे करते हैं।
औरतें अपने बाल का थोड़ा सा हिस्सा काटती हैं।
यह उमराह की मुकम्मल अदायगी का एलान है।
यह इंसान की नई शुरुआत और तवाज़ो की निशानी है।
बिना हल्क या तक़सीर उमराह पूरा नहीं होता।
इस अमल से एहराम की सारी पाबंदियाँ ख़त्म हो जाती हैं।
यह रूहानी पाकीज़गी और सुकून का पैग़ाम देता है।


Paragraph 11 (English – Sunnah Step 1: Ihram preparation)


Paragraph 12 (Hindi – सुन्नत 1: एहराम की तैयारी)

एहराम से पहले ग़ुस्ल करना सुन्नत है।
शरीर पर इत्र लगाया जा सकता है लेकिन कपड़ों पर नहीं।
नाख़ून काटना और बाल छोटे करना भी सुन्नत है।
नियत के साथ दो रकअत नमाज़ पढ़ना चाहिए।
यह इंसान को रूहानी तौर पर तैयार करता है।
एहराम मीक़ात से पहनना ज़रूरी है।
नियत और तलबिया पढ़कर सफ़र शुरू होता है।
यही उमराह की पाक शुरुआत है।


Paragraph 13 (English – Sunnah Step 2: Tawaf etiquettes)


Paragraph 14 (Hindi – सुन्नत 2: तवाफ़ की सुन्नतें)

तवाफ़ की शुरुआत हज्र-ए-असवद के इस्तिलाम से करना सुन्नत है।
पहले तीन चक्करों में मर्द तेज़ क़दम चलते हैं।
मर्द तवाफ़ के दौरान दाहिना कंधा खुला रखते हैं।
हर चक्कर में दुआ और ज़िक्र करना चाहिए।
रुक्न-ए-यमानी और हज्र-ए-असवद के बीच दुआ पढ़ना सुन्नत है।
तवाफ़ के बाद मक़ामे इब्राहीम पर नमाज़ पढ़ना अफ़ज़ल है।
ज़मज़म का पानी पीना भी सुन्नत है।
इससे उमराह का सवाब और बढ़ जाता है।


Paragraph 15 (English – Sunnah Step 3: Sa’i etiquettes)


Paragraph 16 (Hindi – सुन्नत 3: सई की सुन्नतें)

सई की शुरुआत “इन्न-सफ़ा वल-मरवा” आयत पढ़कर करनी चाहिए।
सफ़ा से काबा की तरफ़ रुख करके दुआ करना सुन्नत है।
मर्द हरे निशानों के बीच हल्की दौड़ लगाते हैं।
औरतें आराम और सादगी से चलती हैं।
हर चक्कर में अल्लाह से दुआ करना सुन्नत है।
सई सब्र और तवक्कुल के साथ अदा करनी चाहिए।
यह हज़रत हाजरा (अ.स) की क़ुर्बानी की याद दिलाती है।
इससे उमराह और रूहानी बन जाता है।


Paragraph 17 (English – Sunnah Step 4: Halq/Taqsir manners)


Paragraph 18 (Hindi – सुन्नत 4: हल्क/तक़सीर की सुन्नतें)

मर्दों के लिए पूरा सर मुँडवाना सुन्नत है।
पैग़म्बर ﷺ ने उनके लिए दुआ की जो सर मुँडवाते हैं।
बाल छोटे करना भी जायज़ है लेकिन कम सवाब है।
औरतें थोड़े से बाल काटती हैं।
यह अल्लाह के सामने तवाज़ो की निशानी है।
यह अमल सई के बाद अदा किया जाता है।
यही उमराह की मुकम्मल अदायगी है।
इससे बंदा रूहानी तौर पर नया हो जाता है।


Paragraph 19 (English – Spiritual Benefits)


Paragraph 20 (Hindi – रूहानी फ़ायदे)

उमराह गुनाहों को मिटा देता है और दिल को ताज़ा करता है।
यह अल्लाह के क़रीब करता है और ईमान को मज़बूत करता है।
यह सब्र, तवाज़ो और शुक्र का सबक़ सिखाता है।
उमराह मुसलमानों में भाईचारा और एकता पैदा करता है।
यह पैग़म्बरों और सहाबा की क़ुर्बानी की याद दिलाता है।
उमराह इंसान को आख़िरत की तैयारी कराता है।
यह अल्लाह की रहमत और मग़फ़िरत पाने का ज़रिया है।
उमराह हर मोमिन की रूहानी ताज़गी का सफ़र है।

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